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दर्द को कागज़ पर उतारने की कोशिश करता हूँ मैं
बहते हुए पानी को रोकने की गुजारिश करता हूँ  मैं
सच ने भी जब मेरा साथ ना दिया
तो खुद से झूठ बोलने की सिफारिश करता हूँ मैं

कलम की स्याही मेरे आंसुओं में बह गई
कहना  था जो, वो बात दिल में ही रह गई
बेजुबान हुए हम यूं ही बैठे रहे
खामोशी हमारी सब बात कह गई

यूं ही निशाँ बनाते रहे कलम दवात लिए
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ज़रा ध्यान से देखा जो हमने
तेरी ही सूरत नज़र आई

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