yaadein….

शायद भूल जाऊं वो शिव में मेरा पहला दिन
जब आया था मैं यहाँ, किसी भी दोस्त के बिन
कुछ नया सा जहाँ था, कुछ अलग ही समाँ था
कुछ मेरा दिल जवान था, कुछ seniors का दिल शैतान था

पर भूल ना पाउँगा उसके बाद बीता हर एक पल
जो बीता यहाँ यार दोस्तों के संग
शायद भूल जाए तू भी मुझको कल
पर तेरी याद रहेगी हमेशा मेरे संग.

शायद भूल जाऊं वो ragging का डर
आँखें नीची कर seniors को कहना sir
Hostel gate पर वो रोज़ खाना अंडे
पर भूल ना पाऊंगा वो seniors के funde.

शायद भूल जाऊं 75% attendance की fight
शायद भूल जाऊं वो socials की night
ODC पर ढूंढ CS की assignments टेपना
पर भूल ना पाऊंगा night-out मार CS खेलना

P.S. I wrote parts of this poem when I was in first year…and five years later, it still stands true. And btw, as always this poem is not yet complete.

5 responses to “yaadein….

  1. Hmm.. nice!
    मगर “…..night-out मार CS खेलना…..” कुछ हज़म नहीं हुआ| 😛

  2. nice hai…. bt na to tune kabhi CS khela… aur na SOCIALS lagaye…

    “जब आया था मैं यहाँ, किसी भी दोस्त के बिन”
    और फिर अपने रूमी में मुझे अपना best-friend-forever-types मिला.. :प

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