Khwaabo ke pankh…

ख़्वाबों के पंख होते होंगे बेशक
मंजिलें मगर एक एक कदम बढाने से मिलती हैं .
राहू केतु शनि , मानते होंगे पोंगे पंडित
हाथों की लकीरें तो अपनी मेहनत से बनती हैं .

हजारों गहनों से लदी हो वो बेशक
दुल्हन की शोभा मगर सिन्दूर से बनती है
दिल हथेली पर लिए फिरते हैं दीवाने हज़ार
सच्ची मोहब्बत मगर किस्मत से मिलती है

चरस , शराब , सिगार , सब करके देखा हमने
दो पल चैन की नींद मगर माँ की गोद में ही मिलती है
कई बार देख उसकी तरक्की , मन ही मन जले हैं हम
मगर हर किसी को अपने हिस्से की ही ख़ुशी मिलती है .

ख़्वाबों के पंख होते होंगे बेशक
मंजिलें मगर एक एक कदम बढाने से मिलती हैं …..

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